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शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
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भीष्म उवाच
सत्त्वं रजस्तमश्चैव न गुणास्तं भजन्ति वै |  २१   क
यश्च सर्वगतः साक्षी लोकस्यात्मेति कथ्यते ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति