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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा महाक्रोधात्प्राह रुष्टः पुनर्वचः |  १८   क
प्रज्ञय़ा रहितो दुःखी नित्यं भीतो वनेचरः |  १८   ख
दश वर्षसहस्राणि दशाष्टौ च शतानि च ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति