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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
शीतश्च वाय़ुः प्रववौ प्रय़ाणे तस्य धीमतः |  १५   क
विपांसुलां महीं कुर्वन्ववर्ष च सुरेश्वरः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति