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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि |  १०१   क
एवं मेऽकथय़द्राजन्पुरा द्वैपाय़नो गुरुः ||  १०१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति