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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
कामकामी लभेत्कामं दीर्घमाय़ुरवाप्नुय़ात् |  १०४   क
व्राह्मणः सर्ववेदी स्यात्क्षत्रिय़ो विजय़ी भवेत् |  १०४   ख
वैश्यो विपुललाभः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुय़ात् ||  १०४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति