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कर्ण पर्व
अध्याय ६२
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽन्तरिक्षे नृवराश्वनागां; श्चिच्छेद मार्गान्विचरन्विचित्रान् |  २४   क
ते प्रापतन्नसिना गां विशस्ता; यथाश्वमेधे पशवः शमित्रा ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति