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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
सुमन्तुर्जैमिनिश्चैव पैलश्च सुदृढव्रतः |  १६   क
अहं चतुर्थः शिष्यो वै पञ्चमश्च शुकः स्मृतः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति