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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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जनमेजय़ उवाच
निवृत्तं चास्थितो धर्मं क्षेमी भागवतप्रिय़ः |  २   क
प्रवृत्तिधर्मान्विदधे स एव भगवान्प्रभुः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति