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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्प्रसूतमव्यक्तं प्रधानं तद्विदुर्वुधाः |  २५   क
अव्यक्ताद्व्यक्तमुत्पन्नं लोकसृष्ट्यर्थमीश्वरात् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति