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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मेति कथ्यते |  २६   क
योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् |  २६   ख
सोऽहङ्कार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमय़ो हि सः ||  २६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति