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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
वेदान्वेदाङ्गसंय़ुक्तान्यज्ञान्यज्ञाङ्गसंय़ुतान् |  ३०   क
निर्ममे लोकसिद्ध्यर्थं व्रह्मा लोकपितामहः |  ३०   ख
अष्टाभ्यः प्रकृतिभ्यश्च जातं विश्वमिदं जगत् ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति