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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ त्वय़ा विनिर्दिष्टो अधिकारोऽर्थचिन्तकः |  ३४   क
परिपाल्यः कथं तेन सोऽधिकारोऽधिकारिणा ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति