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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
लोकतन्त्रस्य कृत्स्नस्य कथं कार्यः परिग्रहः |  ३७   क
कथं वलक्षय़ो न स्याद्युष्माकं ह्यात्मनश्च मे ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति