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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञातं वो मय़ा कार्यं तच्च लोकहितं महत् |  ४४   क
प्रवृत्तिय़ुक्तं कर्तव्यं युष्मत्प्राणोपवृंहणम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति