शान्ति पर्व  अध्याय ३२७

जनमेजय़ उवाच

इमे सव्रह्मका लोकाः ससुरासुरमानवाः |  ५   क
क्रिय़ास्वभ्युदय़ोक्तासु सक्ता दृश्यन्ति सर्वशः |  ५   ख
मोक्षश्चोक्तस्त्वय़ा व्रह्मन्निर्वाणं परमं सुखम् ||  ५   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति