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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
याः क्रिय़ाः प्रचरिष्यन्ति प्रवृत्तिफलसत्कृताः |  ५७   क
ताभिराप्याय़ितवला लोकान्वै धारय़िष्यथ ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति