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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
यूय़ं हि भाविता लोके सर्वय़ज्ञेषु मानवैः |  ५८   क
मां ततो भावय़िष्यध्वमेषा वो भावना मम ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति