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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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जनमेजय़ उवाच
ये च मुक्ता भवन्तीह पुण्यपापविवर्जिताः |  ६   क
ते सहस्रार्चिषं देवं प्रविशन्तीति शुश्रुमः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति