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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं क्रिय़ावतां पन्था व्यक्तीभूतः सनातनः |  ६३   क
अनिरुद्ध इति प्रोक्तो लोकसर्गकरः प्रभुः ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति