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शान्ति पर्व
अध्याय २०२
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भीष्म उवाच
एष वेगेन गत्वा हि यत्र ते दानवाधमाः |  १४   क
अन्तर्भूमिगता घोरा निवसन्ति सहस्रशः |  १४   ख
शमय़िष्यति श्रुत्वा ते जहृषुः सुरसत्तमाः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति