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वन पर्व
अध्याय ५१
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वृहदश्व उवाच
क्व नु ते क्षत्रिय़ाः शूरा न हि पश्यामि तानहम् |  १७   क
आगच्छतो महीपालानतिथीन्दय़ितान्मम ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति