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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
अस्य चैवानुजो रुद्रो ललाटाद्यः समुत्थितः |  ७०   क
व्रह्मानुशिष्टो भविता सर्वत्रसवरप्रदः ||  ७०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति