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वन पर्व
अध्याय २४५
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रज्ञावांस्त्वेव पुरुषः संय़ुक्तः परय़ा धिय़ा |  १४   क
उदय़ास्तमय़ज्ञो हि न शोचति न हृष्यति ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति