शान्ति पर्व  अध्याय ३२७

व्यास उवाच

मूर्ध्ना प्रणम्य वरदं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः |  ८३   क
स परिष्वज्य देवेन वचनं श्रावितस्तदा ||  ८३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति