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शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
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जनमेजय़ उवाच
वक्तुमर्हसि शुश्रूषोः प्रजापतिपतेर्हरेः |  २   क
श्रुत्वा भवेय़ं यत्पूतः शरच्चन्द्र इवामलः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति