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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दित |  १२६   क
इह भूत्वा शिशुः साक्षात्किं भवानवतिष्ठते |  १२६   ख
पीत्वा जगदिदं विश्वमेतदाख्यातुमर्हसि ||  १२६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति