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शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
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श्रीभगवानु उवाच
न हि मे केनचिद्देय़ो वरः पाण्डवनन्दन |  २५   क
इति सञ्चिन्त्य मनसा पुराणं विश्वमीश्वरम् |  २५   ख
पुत्रार्थमाराधितवानात्मानमहमात्मना ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति