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शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
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वैशम्पाय़न उवाच
शृणु राजन्यथाचष्ट फल्गुनस्य हरिर्विभुः |  ३   क
प्रसन्नात्मात्मनो नाम्नां निरुक्तं गुणकर्मजम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति