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शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
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श्रीभगवानु उवाच
एकय़ोनित्वाच्च परस्परं महय़न्तो लोकान्धारय़त इति ||  ५३   क
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति