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शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
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अर्जुन उवाच
तेषां निरुक्तं त्वत्तोऽहं श्रोतुमिच्छामि केशव |  ७   क
न ह्यन्यो वर्तय़ेन्नाम्नां निरुक्तं त्वामृते प्रभो ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति