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वन पर्व
अध्याय २७९
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मार्कण्डेय़ उवाच
तथैव प्रिय़वादेन नैपुणेन शमेन च |  २१   क
रहश्चैवोपचारेण भर्तारं पर्यतोषय़त् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति