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उद्योग पर्व
अध्याय ११७
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नारद उवाच
अपराण्यपि चत्वारि शतानि द्विजसत्तम |  ८   क
नीय़मानानि सन्तारे हृतान्यासन्वितस्तय़ा |  ८   ख
एवं न शक्यमप्राप्यं प्राप्तुं गालव कर्हिचित् ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति