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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३३
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व्राह्मण उवाच
नाहं तथा भीरु चरामि लोके; तथा त्वं मां तर्कय़से स्ववुद्ध्या |  १   क
विप्रोऽस्मि मुक्तोऽस्मि वनेचरोऽस्मि; गृहस्थधर्मा व्रह्मचारी तथास्मि ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति