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उद्योग पर्व
अध्याय १२२
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वैशम्पाय़न उवाच
ज्ञातीनां चैव भूय़िष्ठं मित्राणां च परन्तप |  १६   क
शमे शर्म भवेत्तात सर्वस्य जगतस्तथा ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति