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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं धृतराष्ट्रो जनाधिपम् |  १५   क
कुशली विदुरः पुत्र तपो घोरं समास्थितः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति