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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
वाय़ुभक्षो निराहारः कृशो धमनिसन्ततः |  १६   क
कदाचिद्दृश्यते विप्रैः शून्येऽस्मिन्कानने क्वचित् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति