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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
दूरादालक्षितः क्षत्ता तत्राख्यातो महीपतेः |  १८   क
निवर्तमानः सहसा जनं दृष्ट्वाश्रमं प्रति ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति