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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तवचनं तात नृपो राजानमव्रवीत् |  २३   क
न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति