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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मराजस्तु तत्रैनं सञ्चस्कारय़िषुस्तदा |  ३०   क
दग्धुकामोऽभवद्विद्वानथ वै वागभाषत ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति