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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तो धर्मराजः स विनिवृत्य ततः पुनः |  ३३   क
राज्ञो वैचित्रवीर्यस्य तत्सर्वं प्रत्यवेदय़त् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति