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वन पर्व
अध्याय १३४
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अष्टावक्र उवाच
श्लेष्मातकी क्षीणवर्चाः शृणोषि; उताहो त्वां स्तुतय़ो मादय़न्ति |  २८   क
हस्तीव त्वं जनक वितुद्यमानो; न मामिकां वाचमिमां शृणोषि ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति