आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ३३

धृतराष्ट्र उवाच

कच्चिच्च विषय़े विप्राः स्वकर्मनिरतास्तव |  ७   क
क्षत्रिय़ा वैश्यवर्गा वा शूद्रा वापि कुटुम्विनः ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति