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सभा पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽभिषेचनीय़ेऽह्नि व्राह्मणा राजभिः सह |  १   क
अन्तर्वेदीं प्रविविशुः सत्कारार्थं महर्षय़ः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति