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वन पर्व
अध्याय ११२
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ऋश्यशृङ्ग उवाच
आधाररूपा पुनरस्य कण्ठे; विभ्राजते विद्युदिवान्तरिक्षे |  ३   क
द्वौ चास्य पिण्डावधरेण कण्ठ; मजातरोमौ सुमनोहरौ च ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति