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विराट पर्व
अध्याय ३०
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वैशम्पाय़न उवाच
तद्वलाग्र्यं विराटस्य सम्प्रस्थितमशोभत |  ३०   क
दृढाय़ुधजनाकीर्णं गजाश्वरथसङ्कुलम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति