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वन पर्व
अध्याय ३३
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द्रौपद्यु उवाच
अकस्मादपि यः कश्चिदर्थं प्राप्नोति पूरुषः |  १४   क
तं हठेनेति मन्यन्ते स हि यत्नो न कस्यचित् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति