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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
अय़ुद्धमनवस्थानं सङ्ग्रामे च पलाय़नम् |  ९६   क
भीरूणामसतां मार्गो नैष दाशार्हसेवितः ||  ९६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति