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वन पर्व
अध्याय ३३
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द्रौपद्यु उवाच
एकान्तेन ह्यनर्थोऽय़ं वर्ततेऽस्मासु साम्प्रतम् |  ४१   क
न तु निःसंशय़ं न स्यात्त्वय़ि कर्मण्यवस्थिते ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति