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वन पर्व
अध्याय ३३
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द्रौपद्यु उवाच
वहूनां समवाय़े हि भावानां कर्म सिध्यति |  ४८   क
गुणाभावे फलं न्यूनं भवत्यफलमेव वा |  ४८   ख
अनारम्भे तु न फलं न गुणो दृश्यतेऽच्युत ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति