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वन पर्व
अध्याय ३३
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द्रौपद्यु उवाच
व्यसनं वास्य काङ्क्षेत विनाशं वा युधिष्ठिर |  ५२   क
अपि सिन्धोर्गिरेर्वापि किं पुनर्मर्त्यधर्मिणः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति